क्योंकि ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा Hindi Romanchak Kahani


क्योंकि ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा



ऑफिस से आकर पर्स कंधे पर से उतारा ही था कि माँ का फ़ोन आ गया, "हाँ? पहुँच गईं घर"?

"हाँ माँ, पहुँच गयी"। मैंने थकी सी आवाज़ में जवाब दिया।

"नरसिंह मामा को हार्ट अटैक आया है", माँ की करुणा भरी आवाज़ के साथ ही उनकी सिसकी भी सुनायी दी।

"अरे, कब? कैसे? " मैं सच में घबरा गयी थी, माँ के बारे में सोच कर। बुरी तरह से हिल गयी होंगी वह। मामा-नाना के लिए तो मैं परेशान थी ही, पर ऐसे में मुझे माँ की भी कम चिंता नहीं हो रही थी।

ऐसे समय में भी घबराहट के मारे मेरे मुँह से यही निकला था, "और नरेन मामा"? वह कहाँ पर हैं"?

“वह वहीं है, कर रहा है सब काम”। माँ ने रोते हुए बताया था।

थोड़ी शांति सी मिली थी मन को। आनन-फानन में सामान पैक कर हमने रात की ट्रेन पकड़ ली थी। ट्रेन की बर्थ पर लेट, सारी रात कच्ची-पक्की नींद में भी मामा-नाना, नरेन मामा और वीरेन मामा ही चक्कर काटते रहे।

माँ के मामाजी, यानि नरसिंह मामा, जिन्हें हम बच्चे मामा-नाना कहते थे, के दो बेटे थे। बड़े नरेन मामा, और छोटे वीरेन मामा। मामी-नानी का देहांत काफी पहले ही हो गया था। माँ से दोनों मामा काफी छोटे थे। कई वर्षों से दोनों मामाओं में आपस में बातचीत बंद थी। दोनों रहते भी अलग-अलग थे।

मुझे याद है, जब हम छोटे थे, जब भी मामा-नाना हमारे यहाँ आते थे, तब अक्सर हम बच्चों को किसी न किसी बहाने से उस कमरे से बाहर भेज दिया जाता था। पर तब भी अपनी खोजी प्रवत्ति के चलते हम सबने इतना तो पता लगा ही लिया था कि नरेन मामा, मामा-नाना से नाराज़ होकर घर छोड़ कर चले गए हैं। न वह वीरेन मामा या मामा-नाना से बात करने को तैयार थे, न अपने घर ही जाते थे। जबकि मामा-नाना उनको बहुत समझाना चाहते थे, और वे लोग, यानि मामा-नाना और वीरेन मामा उनसे माफ़ी भी माँगना चाहते थे, पर नरेन मामा ऐसी किसी भी बात के लिए तैयार ही नहीं थे।

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माँ अपने मायके में सबसे बड़ी बहन थीं। उनका काफी रुतबा भी था। हमारे ननिहाल की तरफ के दूसरे रिश्तेदार भी अक्सर पापा - माँ से अपने गंभीर मसलों पर चर्चा किया करते थे या राय लिया करते थे। हमारे घर पर मामा-नाना और वीरेन मामा-विभा मामी के परिवार का बराबर आना जाना था,  और नरेन मामा-कामना मामी के परिवार का भी। पर हमेशा अलग-अलग। हम लोगों ने उन्हें साथ आते नहीं देखा कभी। बल्कि यदि कभी नरेन मामा आकर वीरेन मामा को बैठा देखते थे, तो तुरंत वापस चले जाते थे। मुझे यह भी याद है कि माँ-पापा से बात करते-करते, नरेन मामा को याद कर, मामा-नाना अक्सर रोने लग जाते थे।

हमारी वानर सेना की मिलीजुली तहक़ीक़ात से यह पता चला था कि पहले तो दोनों मामा, मामा-नाना के साथ ही रहते थे, पर बाद में बड़े मामा यानि नरेन मामा अलग रहने लगे थे। नरेन मामा जीनियस, परिश्रमी और भावुक टाइप के थे। बचपन से ही हम सुनते आ रहे थे कि नरेन मामा कॉम्पिटिटिव एक्ज़ाम्स की तैयारी कर रहे हैं। सबको उम्मीद थी कि नरेन ज़रूर आईएएस, पीसीएस बनेगा। वीरेन मामा यानि छोटे मामा पढ़ाई-लिखाई में सामान्य ही थे। पढ़ाई पूरी कर उन्होंने नौकरी कर ली थी और समय पर उनका विवाह भी हो गया था। । पर बड़े मामा अभी एक्साम्स की तैयारी कर रहे थे। मामा-नाना का स्तर मध्यमवर्गीय ही था। फिर भी नरेन मामा को उनका पूर्ण सहयोग और समर्थन प्राप्त था। नरेन मामा की पूरी कोशिशों के बावजूद कभी मेन्स, कभी इंटरव्यू रह जाता था। आखिरी अटेम्प्ट के पहले मामा-नाना के घर में काफी टेंशन का माहौल था। मुझे तो माँ भी उन दिनों टेंशन में ही लगती थीं। शायद वह अपने मामा से, भाइयों से दिल से जुड़ी थीं। पर किस्मत ! हर प्रकार से योग्य होते हुए भी, आखिरी अटेम्प्ट में भी, नरेन मामा यूपीएससी क्लियर नहीं कर पाए थे। उस के बाद के दिनों की ही बात है, पता नहीं मामा-नाना या वीरेन मामा की किस बात पर नाराज़ होकर नरेन मामा घर छोड़ कर चले गए थे और एक छोटा सा घर किराए पर ले कर रहने लगे थे।

नाराज़गी की पराकाष्ठा यह थी, कि उन्होंने किसी को बताये बिना, अकेले ही मंदिर में शादी भी कर ली थी। अपनी नयी नवेली दुल्हन,यानि हमारी कामना मामी को भी अपने घर वालों से नहीं मिलवाया था।

पर न जाने कैसी अजब नाराज़गी थी उनकी। एक ओर तो वह उनसे बात न करके, मनाने का मौका न देकरके, उन्हें देखते ही उस जगह से उठ कर चले जाकर के, आँखें न मिला करके, यानि हर प्रकार से उनकी अवहेलना करके, नरेन मामा उन लोगों को दुःख देने पर उतारू थे। वहीं दूसरी ओर, किसी दूसरे को इस मामले में मुँह खोलने तक की भी अनुमति नहीं थी। इस मामले में, उन्होंने न कभी किसी के आगे खुद मुँह खोला, न कभी किसी और को कुछ बोलने का मौका दिया। कभी किसी ने नरेन मामा के लिए, चाहे सहानुभूति में ही कुछ कहा हो, जो मामा-नाना या छोटे मामा के विरुद्ध जाता हो, तो उसे मामा अच्छी-खासी सुनाकर ही छोड़ते थे। यहाँ तक कि एक बार तो उन्होंने ऐसा कुछ सुनने पर, किसी के ऊपर हाथ तक उठा दिया था।

मुझे ऐसा लगता था कि नरेन मामा इस शेर को पूरी तरह से फॉलो करते थे,

"मसाइल मेरे और उनके बीच हज़ार सही, पर ज़माने का हमारे बीच काम ही क्या ?"

नरेन मामा की इस विचित्र नाराज़गी के ऊपर ही माँ के इस तरह के कमैंट्स आते थे कि "हीरा सा लड़का है। स्वयं तो उन लोगो से इतना गुस्सा है कि उनकी ओर देखता तक नहीं, बात नहीं करता, पर उन्हीं लोगों पर जान न्योछावर किये रहता है। उनके खिलाफ कोई कुछ बोल ही नहीं सकता, उनके आगे चट्टान बन कर खड़ा रहता है"।

बस, माँ और पापा ही उन लोगों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते रहते थे। उनकी हमेशा कोशिश रहती थी कि दोनों मामाओं में सुलह हो जाए पर इतने वर्षों बाद भी, अभी तक उन्हें इस काम में सफलता नहीं मिली थी। उनके अभी भी दोनों पार्टियों यानि नरेन मामा- कामना मामी और मामा-नाना, वीरेन मामा और विभा मामी से पूर्ववत सम्बन्ध थे। हाँ, पर इतनी सावधानी अवश्य बरती जाती थी कि दोनों पार्टियों का आमना-सामना होने को यथासंभव टाला जाता था। यदि कभी नरेन मामा पहले से आये हुए होते थे और मामा-नाना या वीरेन मामा-विभा मामी कोई आ जाए, तो नरेन मामा तुरंत उठ कर चले जाते थे।

पिछली बार जब मैं बच्चों की छुट्टियों में घर आयी थी, तभी नरेन मामा को देखा था। मेरा ध्यान गया था कि समय के साथ वह और अधिक हैंडसम लगने लगे थे। मैं नाश्ता करके लॉन की धूप का आनंद ले रही थी कि तभी नरेन मामा आये थे। गेट खोल कर जल्दी-जल्दी अंदर जाने लगे थे कि लॉन में मुझे बैठे देख वापस मुड़ कर इधर आ गए थे। मुझसे लाड़ से पूछा था, "अरे निम्मी? कब आयी तू"? "परसों ही आयी हूँ मामा। मम्मी के पास कुछ दिन रहने का मन था, सो आ गयी"। उनका अभिवादन कर मैंने कहा था। "चल, बढ़िया किया। तो अभी तो कुछ दिन रहेगी न। घर आना। हाँ ? ज़रूर से, तेरी मामी बहुत खुश होगी तुझे देख कर। चलता हूँ, अभी ज़रा जल्दी में हूँ। जीजी से कुछ काम था"। मैंने सिर हिला कर हामी भरी।

मामा तेज़ी अपने कुर्ते की जेब में कार की चाभी डालते हुए अंदर चले गए। मैं भी उठने को थी कि अंदर जाकर चाय-वगैरा में माँ को मदद कर दूँ। पर फिर लगा कि हो सकता है मेरी उपस्थिति में मामा खुल कर बात न कर पायें। ऐसा सोच मैं वहीं बैठी रही। पर उन्हें देख मेरे दिमाग में बराबर यही चलता रहा कि हर किसी से इतना प्यार करने वाले और इतने लाड़ से बात करने वाले नरेन मामा अपने पिता और सगे भाई के मामले में कैसे इतने कृपण हो गए हैं कि उनकी शकल तक देखना भी उन्हें गवारा नहीं। कैसे नहीं भुला पाते हैं वह पुरानी कड़वाहट को। उन लोगों को क्षमा क्यों नहीं कर पाते हैं वह ?

थोड़ी देर बाद ही मामा अंदर से आकर, मुझे दूर से ही हाथ हिलाते हुए वापस चले गए थे।

उस बार मैं, माँ के साथ उनके घर भी होकर आयी थी। कामना मामी से मिलकर बहुत अच्छा लगा था। बड़े ही स्नेह और अपनत्व से मिली थीं वे हमसे। चलते समय मुझे सिन्दूर लगा कर, मेरी गोदी में कोछा डाल कर, एक सूट देकर और बड़े ही प्यार से गले लगा कर, विदा किया था उन्होंने मुझे। माँ से पता चलता रहता था कि वह भी मामा-नाना और घर के बाक़ी सब लोगों साथ मिलकर ही रहना चाहती हैं, पर अभी नरेन मामा को तैयार नहीं कर पायी हैं। माँ उनकी भी तारीफ करते नहीं अघाती थीं।

नरेन मां के वापस चले जाने के बाद, माँ जब मेरे पास आकर बैठीं, तब मैंने उनसे पूछा था, "नरेन मामा क्यों आये थे माँ"?

"अरे वही, पैसे देने आया था। महीना शुरू हुआ है न। तुझे बताया तो था"।

याद आ गया था मुझे कि काफी समय से नरेन मामा, नाना को देने के लिए माँ को पैसे दे कर जाते हैं। पहले तो नाना तैयार नहीं होते थे उस पैसे को लेने को। पर फिर बाद में माँ और पापा के बहुत समझाने पर वे उस पैसे को लेने लगे थे और उसका उपयोग भी करने लगे थे।

इन्होंने आवाज़ दी कि स्टेशन आ गया है, तो, विचारों की श्रंखला टूटी। घर पहुँच कर नाश्ता आदि करके जब हम अस्पताल पहुंचे, तो नाना को देख तसल्ली सी हुई थी मन में। काफी बेहतर लग रहे थे वह। हल्का सा ही स्ट्रोक था। सही समय पर इलाज मिल गया था। ईश्वर की कृपा रही थी। वीरेन मामा, विभा मामी से मिलना हुआ। पता चला, रात में नरेन मामा, कामना मामी थे और अभी घर गए हैं। थोड़ी देर बाद आते ही होंगे। वीरेन मामा ने माँ को अलग लेजाकर धीरे से कहा, "जीजी, आप दद्दा को समझाइये न। उनको यहाँ देख-देख कर ही पापा की तबियत में सुधार आ रहा है"। माँ ने धीरे से सर हिला कर अपना हाथ उनके कंधे पर रख दिया था। न जाने क्यों मन में एक आस दृढ़ होती जा रही थी कि अब नाना जल्दी ही बिलकुल ठीक हो जाएंगे। क्योंकि अब नरेन मामा हैं उनके साथ।

नाना अस्पताल से डिस्चार्ज हो रहे थे। साथ में मिली थीं ढेर सारी दवाइयां और डाक्टरों की हिदायतें। नरेन मामा ने वीरेन मामा से अभी भी अबोला ही कर रखा था। हालांकि नाना से वह बड़े प्यार से हाथ पकड़ कर माथा सहला कर 'हाँ, हूँ' में बात कर लेते थे। नरेन मामा ने पहले ही कह दिया था कि 'जीजी, सबको बता दीजिये, पापा डिस्चार्ज होकर सूर्या विहार - जहाँ नरेन मामा का घर था - ही जाएंगे।' किसी की हिम्मत नहीं पड़ी थी उस समय उनकी बात काटने की।

परंतु, वहां लिफ्ट नहीं थी और उनका फ्लैट चौथी मंज़िल पर था। जबकि मामा-नाना का बंगला शहर की मेन रोड पर ही था, तो डॉक्टरों की राय मानते हुए नाना को उनके घर 'कृष्णा धाम' ही लाया गया था।

बस, फिर तो जैसे घर में कोई उत्सव का माहौल हो गया था। कहीं बड़ी मामी नाना के लिए सूप बना रही हैं, कहीं छोटी मामी सबके लिए चाय-नाश्ते के प्रबंध में लगी हैं, बच्चों में भी दोस्ती हो गयी थी । शोर न मचाने की ताकीद के अनुसार, सभी दरवाज़ा भिड़ा कर ताश और लूडो खेलने में लगे थे। माँ और पापा नाना के पास बैठे उनसे हलकी-फुलकी बातें कर रहे थे। नरेन मामा ने आकर नाना को एहतियात से उठा कर दवा खिलाई फिर वापस लिटा दिया। वह जाने को ही थे कि नाना ने उनका हाथ पकड़ लिया। फिर अनुनय भरे स्वर में बोले, "अब तो नहीं जाओगे न बेटा"। सभी की आँखें उन दोनों की तरफ ही थीं। वीरेन मामा भी मुड़ कर उन दोनों को ही देख रहे थे। नरेन मामा कुछेक पल मौन रहने के बाद धीरे से बोले, "कल फिर आऊंगा" और बाहर निकल गए।

अचानक न जाने क्या हुआ वीरेन मामा ने बाहर जाते हुए नरेन मामा को तेज़ी से आगे आकर, पीछे से ज़ोर से पकड़ लिया था और उनकी पीठ से लग, उन्हें अपनी बाहों से कस कर बांधे, रुआंसे स्वर में बोल उठे थे, "हम लोगों को किसके भरोसे छोड़ कर जा रहे हो दद्दा"? नरेन मामा कुछ पल वैसे ही भौचक से खड़े रहे। बिलकुल अवश। सिर झुका हुआ था, आँखों से अश्रुपात रुक नहीं पा रहा था और उनकी अपनी बाहें पीछे खड़े वीरेन मामा ने कस कर बाँध रखी थीं। वीरेन मामा बोले जा रहे थे "जब तक माफ़ नहीं करोगे  दद्दा,  जाने नहीं दूंगा, खड़े रहो ऐसे ही"।

किसी तरह पीछे घूम कर वीरेन मामा को अपने सीने से लगा लिया था नरेन मामा ने। देर तक दोनों भाई एक दूसरे के गले लग रोते और उलाहने देते रहे थे। नरेन मामा कह रहे थे "पहले नहीं रोक सकता था ऐसे हाथ पकड़ कर"? वीरेन मामा भी रोते-रोते जवाब दे रहे थे "कितनी बार तो करना चाहा था, पर लगा कहीं तुम गुस्से में बेइज़्ज़ती कर भगा न दो" तभी देखा तो दोनों मामियाँ भी दरवाज़े पर चाय नाश्ते की ट्रे पकड़े संकोच में खड़ी थीं। उस भरत मिलाप को जिसने भी देखा, उसकी आँखें सूखी न रह पायी थीं। पापा ने ही फिर उठकर दोनों भाइयों को बैठाया था। पानी पिलाया था। चाय-नाश्ते के दौर के साथ वातावरण खुशनुमा हो गया था। नाना के चेहरे पर अलौकिक संतोष का भाव दिखाई दे रहा था।

दोनों मामाओं के मिलाप के इस सुखद अंत से हम सभी को एक असीम आनंदानुभूति हुई थी।

पर कुछ सवाल मेरे मन को, मेरे क्या, शायद सभी के मन को, लगातार मथ रहे थे -

· क्या बड़े मामा को अपने पिता व भाई से इतनी अधिक नाराज़गी दिखाने की ज़रुरत थी? वह भी उस स्थिति में जब उनकी अपनी जान अपने परिवार में ही बसती थी ? क्या उन्हें बड़प्पन दिखते हुए सबको माफ़ नहीं कर देना चाहिए था?

· जैसे आज किया, वैसा कुछ करके, क्या छोटे मामा को पहले ही बड़े मामा को कैसे भी करके मना नहीं लेना चाहिए था ?

· वह तो ईश्वर की कृपा थी कि नाना को उन्होंने माइल्ड अटैक ही दिया था और नाना इस हलके आघात को झेल गए थे। यदि ईश्वर इस समय इतना मेहरबान न होता तो ?

· क्या इस दीर्घ अबोलेपन और नाराज़गी को पहले ही दूर नहीं किया जा सकता था?

· क्या यह इतना मुश्किल था?

दोस्तों, बेहतर है, हम समय रहते ही चेत जाएँ। क्या पता ईश्वर ने किसके खाते में कितनी सांसें लिखी हैं। कहीं ऐसा न हो बाद में सिवा पछतावे के हमारे कुछ हाथ न लगे।

यदि कोई आपसे नाराज़ है, या यह भी संभव है कि किसी ने साफ़-साफ़ दर्शाया न हो पर आपको उसके हाव-भाव से या उसके असामान्य मौन से यह संकेत मिलता हो कि वह अब आपसे पहले की तरह नहीं मिलता तो कैसे भी करके पता लगाइये कि वास्तविकता क्या है। यदि आप कहीं से भी गलती पर हैं तो बन जाइये वीरेन मामा और मना लीजिये उसे।

और यदि आप खुद नाराज़ हैं किसी से और वह यह बात नहीं समझ पा रहा है तो सौम्य शब्दों में समझाइये उसे उसकी ग़लती। या फिर अपना दिल इतना बड़ा कीजिये कि उसे क्षमा कर पायें। पर घुट-घुट कर, नाराज़गी, कुंठा और अबोलेपन के साथ ज़िंदगी मत बिताते रहिये। अपने लोगो साथ मेल-मिलाप से और ख़ुशी ख़ुशी ज़िंदगी बसर कीजिये । नाराज़गी कुछ समय की फिर भी अच्छी लगती है, ज़्यादा लम्बी होने पर घुटन बन जाती है। इसलिए अपने लोगो के साथ मेल मिलाप से ख़ुशी खुसी ज़िंदगी बसर कीजिये। क्योंकि यह ज़िंदगी नहीं मिलेगी दोबारा।


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