मौर्य वंश के
महान सम्राट अशोक
के राजकाल (ईसा
पूर्व 269 से 232) में इस
नगर को बसाया
गया था। फिर
जब छठी शताब्दी
में प्रवरसेन कश्मीर
के राजा बने
तब उन्होंने हारी
पर्वत के पास
नए भवन बनवाए
और राजधानी का
नाम 'प्रवरपुर' रखा,
मगर लोग राजधानी
को श्रीनगर ही
कहते रहे। आठवीं
तथा नौवीं शताब्दियों
में सम्राट ललितादित्य
(राज्यकाल 724-761 ईस्वी) तथा राजा
अवंतीवर्मन (855-883 ईस्वी शासनकाल) के
दौरान अनेक अद्भुत
भवनों का निर्माण
हुआ । वस्तुतः
शिल्पविद्या उन दिनों
अपने उच्च स्तर
पर थी। अवंतीवर्मन
ने आश्चर्यजनक अवंतीस्वामी
मंदिर का निर्माण
करवाया तो ललितादित्य
ने भी भव्य
भवन बनवाए और
मार्तंड मंदिर का निर्माण
करवाया। इस प्रकार
की गतिविधियाँ तब
से ही चलती
आ रही हैं,
मगर भवनों के
निर्माण का तरीका
समय के साथ-साथ बदलता
रहा ।
झेम गुप्त, दिद्दा, कलश
देव तथा जयसिंह
ने भिन्न प्रकार
के भवन और
राजमहल बनवाए, परंतु ये
पिछली तरह की
वास्तुकला का ही
नया नमूना थे।
11वीं और 14वीं
शताब्दियों के बीच
लोहार वंश के
राजाओं का शासन
था । यह
उथल-पुथल का
दौर था, इस
कारण उल्लेख करने
लायक वास्तुकला का
कोई प्रतिमान भी
स्थापित न हो
सका। ज़ैन-उल-आबदीन (शासन काल
: 1420-1470 ईस्वी) को कश्मीर
के लोग आज
भी 'बडशाह' के
नाम से याद
करते हैं। प्रतिभासंपन्न
राजा एक उदार
व्यक्ति था ।
उसके दौर के
कारीगरों ने भवन निर्माण में पत्थरों के साथ-साथ लकड़ी
का भी प्रयोग किया। 'बडशाह' के समय में भाषा और साहित्य का भी विकास हुआ। कई उल्लेखनीय
ग्रंथों का अनुवाद हुआ, जैसे महाभारत और कल्हण द्वारा लिखित राजतरंगिणी का फ़ारसी अनुवाद।
बडशाह स्वयं भी कविता करते थे तथा कश्मीरी, फ़ारसी, संस्कृत और तिब्बती भाषाएँ अच्छी
तरह जानते थे। श्रीनगर के जैनाकदल इलाके में बडशाह का मकबरा, अपनी विशिष्ट निर्माण
शैली के कारण जाना जाता है। कदल यानी पुल, जैन-उल-आबदीन के नाम से बना पुल- 'ज़ैनाकदल'।
यह शहर के बीचों-बीच बहती हुई जेहलम नदी पर बना हुआ है।
शहर के पुल सुरम्य
हैं। ये पुरानी कारीगरी का विशेष नमूना हैं, जिनमें लकड़ी का खूब इस्तेमाल हुआ है।
ये देशज शिल्प के प्रतिमान हैं। इनके निर्माण का एक अलग तरीका रहा है, जिसे कश्मीर
के कारीगरों ने अपने हुनर के कारण अपनाया था। जिस स्थान पर भी पुल बनाना हो वहाँ पर
वे पत्थरों से भरी हुई नौकाएँ डुबो देते । नदी के दोनों किनारों पर जब इस प्रक्रिया
में पत्थर पानी के ऊपर आने लगते तो वे ढीले पत्थरों की नींव को लकड़ी के लट्ठों से
रोक लेते। फिर इसी नींव पर देवदारों को समकोण में खड़ा करके एक ढाँचा तैयार करते। यह
ढाँचा इतना ऊँचा ले जाया जाता जितना कि हाऊस-बोट के जाने के लिए जरूरी हो, क्योंकि
उन दिनों यातायात का मुख्य साधन नौकाएँ ही थीं। नदी के मध्य में भी इसी प्रकार के दो
ढाँचे खड़े किए जाते और नदी के पानी के बहाव का मार्ग निर्धारित किया जाता। लकड़ी के
मोटे तख्तों से इन ढाँचों को मजबूती प्रदान की जाती। वस्तुतः ऐसे पुलों की मजबूती का
कारण यही लकड़ी के ढाँचे हैं।
इसी तकनीक से श्रीनगर
शहर के सातों पुल बनाए गए थे, जैसे- 'अमीरा-कदल' (पहला पुल), 'हब्बा-कदल' (दूसरा पुल),
'फतेह-कदल' (तीसरा पुल), ‘जैना-कदल’ (चौथा पुल), 'आली-कदल' (पाँचवाँ पुल), 'नवा-कदल'
(छठा पुल) तथा ‘सफा-कदल’ (सातवाँ पुल)। यही कारण है कि श्रीनगर को 'सात
पुलों का शहर' (The city of seven bridges) भी कहा जाता है। हालाँकि अब इस नदी पर सीमेंट
से निर्मित पक्के पुल भी बनाए गए हैं, मगर पुराने पुल अब भी अपने शिल्प कौशल के कारण
ध्यान आकर्षित करते हैं। 'जैना-कदल' जैनुल आबदीन ने ईस्वी 1427 में बनवाया था। इसी
प्रकार ‘आली-कदल’, 1415 ईस्वी में सुल्तान अली शाह ने बनवाया
था । 'फतेह-कदल', 1500 ईस्वी में सुल्तान फतेह शाह ने, तो 'हब्बा-कदल', 1573 ईस्वी
में सुल्तान हबीब शाह ने, ‘नवा-कदल’, 1666 ईस्वी में नुरूदीन खान बामजई ने, ‘सफा-कदल'
सैफ-उद्दीन खान ने 1671 ईस्वी में और फिर 'अमीरा-कदल' अमीर-उद्दीन खान ने 1744 ईस्वी
में बनवाया था ।
जिस तरह विश्व के बड़े-बड़े
शहरों के मुख्य नदियों के पुलों पर छोटे-छोटे बाजार लगते हैं, उसी तरह 'जैना-कदल' और
'हब्बा-कदल' पर भी बाजार लगते रहे हैं। पेरिस का ‘पोंत द आर्ट' पुल ही लें, वहाँ पुल
की रेलिंग पर हजारों की संख्या में कई प्रकार के ताले लटक रहे होते हैं, जहाँ प्रेमी
युगल आकर ताले पर अपना नाम लिखकर चाबी सेम नदी में फेंकते हैं। पैदल यात्रियों के
लिए बने इस पुल की
तरह ही श्रीनगर के हब्बाकदल पुल के ऊपर बने बगल के पथ पर माचिस, बैटरी-टॉर्च, छोटे
खिलौने इत्यादि बिकते रहते और वसंत के आगमन पर आस-पास के मोहल्लों के लोग नदी में अखरोट
फेंकते । नटखट, तैराक बच्चे, जो नदी में तैरते रहते उन अखरोटों को इकट्ठा करते। अब
तो हब्बाकदल के पुराने पुल के साथ ही एक नया कंक्रीट पुल बना हुआ है। पुराने ‘अमीरा-कदल'
पर आज भी एक बाजार लगता है और शहर के लोग व सैलानी कुछ-न-कुछ खरीदते हुए अनायास ही
नजर आते हैं।
जेशलम, हलम, जिसे
शहर के लोग 'व्यथ' भी कहते हैं, के दोनों किनारों पर बसा नगर सदियों का इतिहास बयान
करता है। 'अमीरा-कदल' (पहले पुल) के पास ही, नदी के बाएँ किनारे पर, सुंदर शेरगढ़ी
महल स्थित है। यह ऐतिहासिक भवन डोगरा शासनकाल के दौरान डोगरा राजाओं का निवास रहा है।
महाराजा रणबीर सिंह (शासनकाल : 1856-1885) ने इसके परिसर में एक स्वर्ण मंदिर का निर्माण
भी करवाया था। हालाँकि शेर-गढ़ी का पहला निर्माण अफगान गवर्नर, जवान शेर खान ने सन्
1772 ईस्वी में करवाया था, मगर डोगरा राजाओं ने कई परिवर्तन कराए और समय-समय पर नए
निर्माण कराते रहे। भारत की अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यहाँ जम्मू-कश्मीर
सचिवालय भी चलता रहा। आज भी इस अहाते में कई सरकारी दफ्तर हैं ।
दूसरे पुल हब्बाकदल
के साथ ही नदी की बाईं तरफ पुरुषयार मंदिर स्थित है। यह शिव मंदिर 11वीं शताब्दी में
स्थापित हुआ था और तब से ही श्रीनगर के लोगों, विशेषकर हब्बाकदल के आस-पास रहने वाले
लोगों की पूजास्थली रहा है। मंदिर के साथ बना विशाल घाट शहर की सांस्कृतिक एवं सामाजिक
क्रियाकलापों का अभिन्न अंग रहा है। आस-पास के मोहल्लों की हिंदू तथा मुस्लिम स्त्रियाँ
घाट पर एक दूसरे से मिलकर अपने मन की बातें करती सौहार्दपूर्ण सुखद क्षण बिताती नजर
आती रही हैं। यही कारण है कि नदी पर बने घाटों को स्थानीय भाषा में लोग 'यारबल' कहते
रहे हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ है मित्रों से मिलने का स्थान। धीरे-धीरे बहती हुई इस
नदी के दोनों ऐसे कई घाट, कई मंदिर और इबादतगाहें नजर आती हैं, जो किसी भी सैलानी या
शहर को जानने के इच्छुक व्यक्ति का ध्यान अपनी तरफ खींचते हैं।
नदी के तीसरे पुल,
फतेह-कदल से थोड़ा आगे दाहिनी ओर ‘शाह-ए-हमदान' की खानकाह नजर आती है, जिसे 1400 ईस्वी
में बनवाया गया है। यह लकड़ी की नक्काशी और वास्तुकला की उत्कृष्टता के लिए मशहूर है।
पुल के पास में ही श्रीराम त्रिक आश्रम भी है। कश्मीर का त्रिक-दर्शन अद्वैतवादी है।
स्वामी राम जी (1852-1915 ई.) एक साधक थे जो वसुगुप्त की परंपरा का अनुसरण करते हुए
कश्मीर के लोगों की सहायता करते थे। इस आश्रम पर आज भी विभिन्न धर्मों के लोग आते हैं।
आखिरी पुल तक ऐसे कई स्थान हैं जो आकर्षण का केंद्र हैं। जैसे पत्थर-मस्जिद, आली-कदल
के पास ऋषि-पीर का स्थल, बटयार और वूसी साहब का आस्तान आदि ।
पुराने ऐतिहासिक पुलों
के साथ ही अब नए पुल भी मौजूद हैं। ये हैं - ज़ीरो - ब्रिज, अब्दुल्ला-ब्रिज, लाल मंडी
फुट-ब्रिज, नया हब्बा-कदल-ब्रिज, नया फतेह-कदल-ब्रिज तथा नया जैना-कदल-ब्रिज । ये सभी
नये तर्ज के पुल 1950 । ईस्वी के बाद बनवाए गए हैं। जीरो-ब्रिज को अब यातायात के लिए
बंद कर दिया गया है, मगर देवदार की लकड़ी से बने इस पुल को अपना विरसा समझ कर संभाल
कर रखा गया है। नगर के लोग और सैलानी इस पुल पर आकर बैठते हैं और जेहलम को पुराने शहर
की ओर मंद-मंद बहते हुए जाने का अनुपम नजारा देखकर कश्मीर के प्राकृतिक सौंदर्य का
आनंद लेते हैं 1
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