अंधे बहरे बन जाएँ
इस शहर में ट्रांसफर से आए हुए पंद्रह दिन ही हुए थे। अभी किसी से ज़्यादा जान पहचान नहीं हो पायी थी क्योंकि मैं अभी घर के कामो से ही फुरसत नहीं पा पाती थी। कई दिनों से कुछ छोटी-मोटी चीज़ें लानी थीं, पर किसी न किसी कारणवश बाजार जाना टलता ही जा रहा था। पर अब आज अम्माजी पैर के दर्द वाली दवाई की बस एक आखिरी ही डोज़ बची थी, सो अब तो जाना ज़रूरी हो गया था। ड्राइवर को, इनको ऑफिस पहुंचा कर ही वापस आने को बोल दिया था और मैं बाजार के लिए निकल पड़ी थी, अपनी लिस्ट हाथ में थामे। जल्दी ही सारे काम निपट गए, भीड़ इस समय कम थी, शायद इसलिए। वरना कभी-कभी तो एक दुकान से दूसरी दूकान भागते-भागते काफी समय लग जाता है। मैं खड़ी अपनी लिस्ट देख ही रही थी कि क्या खरीदना बचा है, तभी पीछे से किसी ने कंधे पर हाथ मारा। "शिप्रा"? मैं पलटी और खुशी के मारे मुँह से चीख निकल गयी "अरे, संजना तू"? फिर तो, 'यहाँ कैसे, कब, कहाँ' का जो सिलसिला शुरू हुआ तो बातें तभी रुकीं, जब मेरे ड्राइवर ने आकर बताया कि जल्दी घर चलना होगा। उसे साहब ने जल्दी बुलाया है, हेड ऑफिस जाने के लिए।
मन अभी भरा नहीं था, बातें ख़तम नहीं हुई थीं। संजना बोली, “चल, मेरे साथ चल। मैं अभी मिनी के घर ही जा रही हूँ। तू भी आ जा, तुझे देख कर खुश हो जायेगी”। मिनी का नाम सुनते ही मैं और अधिक उत्तेजित हो उठी। सोचा, बच्चों के आने में तो अभी समय है। तीनों आपस में मिल भी लेंगी, और इस बहाने मिनी का घर भी देख लूंगी।
ड्राइवर को बाजार से ही विदा कर, मैं संजना के साथ उसकी कार में मिनी के घर चल दी। मैं, संजना और मिनी कॉलेज में सहेलियाँ बनी थीं। उस समय की, एक दूसरे की हर बात की राज़दार। यह हाल था कि कोई भी बात जब तक तीनो एक दूसरे को बता नहीं लेती थीं, चैन नहीं आता था। बाद में हम सब अपनी-अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गए थे। मोबाइल फोन का ज़माना था नहीं तो आपस में संपर्क भी टूट सा ही गया था।
रास्ते में संजना से घर-परिवार की बातें होती रहीं। संजना की बेटी की शादी हो चुकी है। बेटा-बहू बाहर सेटल्ड हैं। बस, अब सारे दिन की मस्ती है। कभी किसी के घर चली जाती है, कभी कहीं घूम आती है। मैंने अम्मा जी की तबियत की वजह से अपनी स्कूल की लगी लगाई नौकरी छोड़ दी है, सुन कर कहने लगी, "अरे, सास की वजह से कहीं नौकरी छोड़ी जाती है? फुल टाइम मेड लगवा देनी थी। एक बार को सोचा उसे बताऊँ कि मेरी सास मेरे लिए क्या हैं, किसी बाहरी व्यक्ति की ज़िम्मेदारी पर मैं उनको नहीं छोड़ सकती। पर फिर लगा, जितने हलके अंदाज़ में यह बात कर रही है, परिस्थितियों की गंभीरता को शायद न समझ पाए। मैं चुप ही रही।
दरवाज़ा मिनी ने ही खोला था। संजना आगे खड़ी थी। मैंने नोटिस किया कि उसे देख मिनी के चेहरे पर विशेष ख़ुशी नहीं झलकी थी। फिर संजना के हटने पर मुझे देखा, तो ख़ुशी से उसकी बाछें खिल उठी थीं।
ड्राइंग रूम में आराम से सोफे पर पसरते हुए संजना ने पानी की गुहार मचाई। सोफे पर बैठते समय उसमे से चर्र की हलकी सी आवाज़ निकली। “अरे यार, यह सोफ़ा भी। क्या मिनी, तू अभी तक यह पुराना सोफ़ा ही चला रही है। नया क्यों नहीं लेती। मिनी ने सकुचाते हुए मुझे देखा, बोली, “हाँ, वो बनवाना है, बस रह ही जाता है”।
एक प्यारी सी लड़की ट्रे में पानी लेकर आयी। शिष्टता से हमें नमस्ते किया। संजना ने उससे मेरा परिचय करवाया, यह मिनी की बड़ी बेटी है। मम्मी की बचपन की सहेली जान उसने खुशी ज़ाहिर करी और अंदर वापस जाने के लिए मुड़ी ही थी कि संजना ने उसे आवाज़ दे रोक लिया। "स्वीटी सुन" "जी आंटी"? स्वीटी ने पीछे मुड़ कर प्रश्वाचक दृष्टि से हमें देखा। "अरे भाई, तू कोई अच्छा सा लड़का पसंद कर शादी कर क्यों नहीं लेती है? अपनी माँ को कितना परेशान किया हुआ है इतने समय से ? हम को भी फ्री कर”।
कहने की ज़रुरत नहीं कि प्रत्युत्तर में स्वीटी की आँखों में आते-जाते और बदलते भावों ने शब्दों का सम्बल लिए बिना ही सब कुछ कह डालाा । अगर संजना उस भाषा को पढ़ने का बूता रखती तो शायद जीवन में फिर किसी से इस तरह की दिल दुखाने वाली कोई बात न कर पाती।
पर वो तो बस यूँही, एक बेमतलब का जुमला उछाल, अपने बैग में चश्मा ढूंढने में लगी थी। कुछ पलो के अंतराल के बाद जब शायद स्वीटी इस प्रश्न के लिए उपयुक्त शब्द ढूंढ, कुछ बोलने के लिए, मुँह खोलने ही वाली थी कि तभी रसोई से चाय की ट्रे लेकर आती हुई मिनी ने बेटी को उस अप्रिय स्थिति से उबार लिया था। "लो भाई, सब लोग चाय पियो गरमा-गरम। और ये ले शिप्रा, मठरी टेस्ट कर। मैंने कल ही बनायी है"। स्वीटी देख तो, कही मैं गैस तो खुली नहीं छोड़ आयी हूँ। पता नहीं आजकल मुझे क्या होता जा रहा है। कुछ न कुछ भूल ही जाती हूँ"।
एक दिन दोपहर में रसोई समेट कर ज़रा कमर सीधी करने लेटी ही थी कि मेरी भांजी मुग्धा का फ़ोन आया। उत्तेजित लग रही थी। “मौसी, आज दीदी आयी थीं, अभी गयी हैं खाना खाकर”। “हाँ, तो? अच्छी बात है न।”? मैंने कहा। समझ गयी कि हमेशा की तरह उसकी ननद करुणा, अपनी किसी टिप्पणी से आज फिर मुग्धा को भड़का गयी है । "अरे मौसी, अब तो बस मैं करन को बोलने वाली हूँ, अपना हॉस्टल में रहने का इंतज़ाम करने ले। बहुत हो गया। कोई प्रिवीसी ही नहीं है मेरी”।
“हुआ क्या” मैंने कहा। मुग्धा बोली, “दीदी कह रही थीं कि पता नहीं कैसे मैं घर में सलवार कुरता पहन लेती हूँ। जीजाजी तो कभी बर्दाश्त न करें कि उनकी पत्नी उनके सामने यह सब पहन के आये। वो तो घर में भी जीजाजी की पसंद की शार्ट वेस्टर्न ड्रेसेस पहनती हैं और आप लोग मुझे घर में कुछ भी ढंग का नहीं पहनने देते हैं”।
अब मुझे बात का सार समझ आ गया। इसकी नन्द की बुद्धि का लोहा मान मैंने माथे पर हाथ मार लिया। मुग्धा स्वभाव से थोड़ी चंचल है। शायद घर में सबसे छोटी होने के कारण अभी उतनी गंभीरता नहीं आ पायी है उसमें। किसी की भी बात को दिल से लगा बैठती है। वैसे है बहुत संस्कारी और ज़िम्मेदार। एक ही शहर में पोस्टिंग होने के कारण उसने अपने देवर को, जो उसी शहर में रह कर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था,अपने साथ ही रहने को बुला लिया था। हम सभी ने उसके इस निर्णय को बहुत सराहा था। विशेषकर उसकी सास तो बहुत खुश हुई थीं कि अब छोटे बेटे को भी घर का खाना-पीना और देखभाल मिल जायेगी।
अब घर में ये तीनों मुग्धा, उसका पति अमन और देवर करन रहते हैं। मुग्धा ज़िम्मेदार लड़की है। अपने देवर के खाने पीने रहने का, हर तरह से ध्यान रखती है। हालाँकि, इन सबके चलते उसका काम भी काफी बढ़ गया है, पर वह ख़ुशी-ख़ुशी अपने इस दायित्व को निभाती है। पर ज़ाहिर है, इस वजह से उसकी और अमन की प्राइवेसी में थोड़ी कमी भी आयी है। साथ ही, युवा देवर के घर में होने की वजह से हम लोगो ने उसे समझाया था कि घर में शालीन कपडे ही पहनना। बहुत शार्ट ड्रेसेस न पहनना। इस वजह से वह कभी-कभी अपनी उन सहेलियों या पड़ोसियों से तुलना होने पर, जो ससुराल या संयुक्त परिवार की बंदिशों से दूर,एकल परिवार का खुला, मौज मस्ती वाला, स्वतंत्र जीवन जी रही हैं, थोड़ा दुःखी भी हो जाती है। इसलिए हम सब उसे इसके इस अच्छे काम के लिए मोटिवेट करते रहते हैं और उसकी तारीफ़ करते रहते हैं।
पर असली समस्या तो तब आती है जब उसकी ननद, जिसके पति ने अब इसी शहर में नयी नौकरी शुरू की है, अपने भाई-भाभी से मिलने आती है। वैसे मुग्धा और उसकी ननद करुणा दोनों अच्छी सहेलियां है और हमउम्र है। पर अभी करुणा अपनी नयी-नयी मिली स्वतंत्रता के साम्राज्य के मद से उबरी नहीं है। वह जब-तब आकर अपनी भाभी को कुछ न कुछ अपना ऐसा किस्सा बता देती है, जिससे मुग्धा को अपनी सभी ज़िम्मेदारियाँ बंधन प्रतीत होने लगती हैं।
आज करुणा ने आकर बोल दिया, "क्या मुग्धा, तुम सलवार सूट और चुन्नी में घर में रह कैसे लेती हो। अविरल तो मुझे कभी अलाउ ही नहीं करते ऐसे कपड़े घर पर भी पहनने को। उन्हें तो मैं हर समय शार्ट वेस्टर्न ड्रेसेस में और टिपटॉप ही चाहिए। न बाबा न, मैं तो ऐसे बिलकुल नहीं रह सकती"। करुणा के इस एक बेमतलब के, फिजूल जुमले ने मुग्धा को स्वयं को दयनीय स्थिति के आईने के सामने खड़ा कर दिया था। लफ्ज़ों का ये ज़हरीला बम गिरा कर करुणा मुग्धा को फिक्र में छोड़कर चलती बनी थी। मुग्धा को लगने लगा था कि उसकी और अमन की प्राइवेसी में करन रोड़ा बना हुआ है। करन को अपने घर में साथ रखने का अपना निर्णय उसे गलत लगने लगा था।
यदि करुणा ने ज़रा भी समझदारी से काम लिया होता तो यों अनजाने में, अपनी भाभी को इस तरह दुखी करने का न सोच पाती। बल्कि अपनी बातों से मुग्धा का मनोबल बढ़ाती कि वह अपनी ससुराल और अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति कितनी समर्पित है। जिससे अंततः करुणा के ही मायके का भला होता। पर अपने फ़िज़ूल के इस जुमले से करुणा अपने ही भाई का अहित करने चली थी।
कुछ ही दिन बाद मिनी का मेरे घर आना हुआ था। हम दोनों देर तक पुरानी स्मृतियों के ग़लीचों पर चहलक़दमी करते रहे। कालेज की भी खूब यादें ताज़ा हुयीं। मेरा ध्यान गया कि संजना का ज़िक्र आते ही मिनी का चेहरा कुछ उतर सा जाता था। थोड़ी देर बाद मिनी ने कहा, "शिप्रा, स्वीटी के लिए कोई अच्छा लड़का बताओ”। मैंने पूछा, “'वह तैयार है क्या शादी के लिए"? मिनी का चेहरा उतर गया। बोली, "हम लोग तो कबसे ढूंढ ही रहे हैं। बस, जैसे ही कोई सही लड़का मिलेगा, तुरंत कर देंगे शादी। उलटे सीधे प्रोपोज़ल्स आते हैं, तो मना करना ही पड़ता है । जानते बूझते कैसे लड़की को धकेल दें”। यह तो मैंने खुद देखा था कि एक अच्छे पद पर कामकाजी होने के साथ-साथ लड़की हर प्रकार से सुशील, संस्कारी और सुन्दर भी थी। कह सकते हैं कि ढूंढने से भी उसमे कोई कमी निकलना मुश्किल था। उसका अभी तक विवाह न होने का अर्थ सिर्फ यह था कि ईश्वर की ओर से ही अभी उसका समय निर्धारित नहीं हुआ है।
“अरे, मुझे लगा था, अभी स्वीटी ही तैयार नहीं है शादी के लिए” मैंने कहा। “हाँ, उस दिन मैं समझ गयी थी कि संजना की बात सुनकर तुझे ऐसा ही कुछ लगा होगा”। यह संजना तो कभी भी, कुछ भी बोल देती है। कभी अंशुल से नौकरी का पूछती है, कभी स्वीटी से शादी का। अब क्या क्या बताऊँ तुझे ? खुद तो फ्री है, पर आये दिन हमारे घर आकर कुछ भी उल्टा-सीधा कमेंट कर जाती है। इसकी इसी आदत के कारण बच्चे तो उससे चिढ चुके हैं।
मैंने नोटिस किया कि अवचेतन मन में, मैं उस दिन का सोच-सोच कर, जिस दिन संजना मेरे घर आएगी, अभी से ही घबराने लगी थी। उसकी इस आदत के चलते मैं अपने सुखी संसार की खुशियों को दांव पर नहीं लगाना चाहती थी। शायद मैं कोई न कोई बहाना बना कर उस दिन को यथासंभव टालने का प्रयत्न करूँ।
सोच रही थी, प्रॉब्लम की शुरुआत कहां से हुई ? हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बहुत से सवाल हमें बहुत मासूम लगते हैं। हम सामने वाले से अपनापन दिखाते हुए, या बिना किसी ख़ास उद्देश्य के फिजूल के सवाल पूछ तो बैठते हैं, पर यह नहीं समझ पाते हैं कि कहीं हमारे ये नादानी में पूछे गए बेमतलब के सवाल सुनने वाले के दिल में कुंठा और बेबसी का बीज तो नहीं बो रहे हैं। कहीं ऐसा न हो, जो हमें प्रत्यक्ष दिख रहा है, उससे परे भी कुछ हो जो हमारे सामने अप्रकट हो।
हमारी वाणी से निकले शब्द दूसरे पर कितना गहरा असर डाल देते हैं, यह हम कई बार खुद भी नहीं जान पाते। जाने किसकी क्या मजबूरी हो कि झूठ बोल नहीं सकता हो और सच कहना नहीं चाहता हो।
यदि आप इस योग्य हैं कि सामने वाले की समस्या दूर कर सकते हैं, या वास्तव में सहायता करना चाहते हैं, तब आपके सवाल बिलकुल जायज़ हैं । परन्तु यदि आप सिर्फ अपडेट चाहते हैं, या आपका इरादा सिर्फ मज़े लेने का है तो आपके रोज़मर्रा की ज़िंदगी के बेमतलबी सवाल, जिनका उत्तर देने में सामने वाला अचकचा जाए, जैसे - उसकी नौकरी अभी तक क्यों नहीं लग पायी। शादी कब हो रही है। अभी तक बच्चा क्यों नहीं हुआ, बेटा बहू तुम्हारे साथ क्यों नहीं रहते, । अरे, अब तो बहू आ गयी है घर में, उससे पैर क्यों नहीं दबवाती, तो कौन न क़ुर्बान जाएगा इस भोलेपन पर। इस अपनेपन पर।
तो बेहतर है कि जब किसी के घर जाएँ तो अंधे बहरे बन जाएँ, और गूंगे बन, बाहर आएं । शायद किसी का संसार बचा पायें।

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